गाँव – Delhi Poetry Slam

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गाँव

By Yogesh Gairola

स्मृति की अद्भुत अभिव्यक्ति गाँव मेरा याद आया है,
मैं और मेरा बचपन उन गलियों में फिर भरमाया है।
वो घट (water mill) की गुण-मुण सी ध्वनि,
पनघट पर मीठा ख़ील्ल-ख़िलोल,
पानी का छोटा नाला राहों पर फिर भर आया है।
बण (forest) जाने के वक़्त लगाती धाऊ (call) अब भी सुनता हूँ,
जब भी अपनी आँखों का मैं रुख़ गाँव को करता हूँ।
सीढ़ी से वो खेत के जो ऊँचाई को पा जाते हैं,
गाँव से हटकर शायद हम आज पतन को जाते हैं।
कुछ काचा सा कुछ पक्का सा वो घर कितना प्यारा था,
जिसकी चंद पटालों (slate) में सिमटा जहान ये सारा था।
बैठ त्यबार ( )पे मट्ठा पीना, शायद ही वह दिन आये।
गाँव की ताज़ी बारिश में फिर भीग मेरा तन-मन जाए।
छज्जे से पूछा करता था, माँ तू बण से कब आयी?
सोते वक़्त लगा सीने से दादी की वो सुस्ताई।
वो बातें अब ख़्वाब बन गयी, दादी जो बोला करती थी,
चंदा को मामा कह कर जो भावों को तोला करती थी।
सच्चाई कितनी कड़वी है, क्या कड़वा पीना ही होगा,
ये कैसा बंधन है, जिसको अनचाहे जीना ही होगा।
मुक्ति-मुक्ति, मुक्ति दे दे, जीने की कुछ युक्ति दे दे।
ये विकाश मुझे, नहीं चाहिए, बिन आत्मा का शहर तुम्हारा,
हे ईश्वर ग़र दे सकता है, लौटा दे वो गाँव दोबारा।


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