हीर का राँझा – Delhi Poetry Slam

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हीर का राँझा

By Yashi Sharma 

मैं हीर, मेरा रांझा ना हीरों से कम
मैं झील, मेरा प्यासा है बरखा सा नम।

मेरे मन के पवन में वो पतंगों सा लहराता है
मेरी आंखों की गहराइयों को अंबर से ऊंचा वो बताता है
इस दिल की उलझनों को वो ज़ुलफों सा सुलझा कर,
मेरी खुशियों में अपनी मीठी मुस्कान घोल जाता है।

मैं भोर, वो गूंजे जैसे भैरव का ठाट
मैं दिया, वो पावन गंगा की घाट।

अब बस इतनी ही आस है दिल में,
उस रांझा की अधूरी कहानी
अपनी सियाही से रंग जाऊं
जो वो आज़ाद पंछी तो मैं खुला आसमान बन जाऊं।

उसकी ताल मे मैं घुंघरू सी खनकूं
उसकी रातों मे मैं चांदनी सी चमकूं।

हां इतनी ही है चाह...

के दिल में उसे फूलों सा सजा के,
मैं भवरों सी मंडराऊँ
वो मुरली मनोहर हो मेरा,
मैं उसकी दिवानी मीरा बन जाऊँ।


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