By Vivek Srivastava

आज हिन्दुस्तान में?
आज़ादी की अमृत वाली
७५वीं वर्षगांठ में
देखा मैंने हर एक शै को
'हम' से "मैं" कहते हुए
सांस छीनते एक-दूजे का
मानव को मानव से डरते हुए।
देखा स्त्री की अस्मिता तार-तार होते हुए
और देखा धोखे की खंजर आर-पार होते हुए।
देखा मैंने इज्ज़त अपनी हर घर होते हुए
पर ये भी देखा कुछ बच्चों को भूखा सोते हुए।
देखा चहुँ ओर व्यवस्था से दुर्व्यवस्था होते हुए
और देखा स्वतंत्रता का सही मायने खोते हुए।
देखा सबके हक को बुरी तरह लूटते हुए
और आँखों से सपनों को काँच सा टूटते हुए।
हाँ, पर देख यह हुई तसल्ली कोई तो है जहान में
जो इज्ज़त करता है अब भी आज़ादी की हिंदुस्तान में।
करते नमन हम तीन रंग
उन दो महान इंसानों को
एक कृषक जो अन्न उपजाए
दूजा सीमा पर प्रहरी जवानों को।