कृष्ण का मथुरा प्रस्थान – Delhi Poetry Slam

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कृष्ण का मथुरा प्रस्थान

By Vishesh Middha

कान्हा जब मथुरा ओर चले, सबसे यूँ मुख मोड़ चले,
गौ, गोपियाँ और घर-बार, सबको भीतर से तोड़ चले।

अंतर्मन में घबरायी सी, क्षण एक नहीं भरमायी सी,
विरह-वियोग एक ओर रखे, बोली राधा सकुचायी सी।

राधा:
"कान्हा! क्या यही था प्रेम तुम्हारा? बस चंद लीलाओं का मारा?
यूँ छोड़ चले हो तुम मुझको, और ना मिलोगे फिर दोबारा?"

सुनकर राधा की पीड़ा, कान्हा ने अपना मुख मोड़ा,
जो हो चुका था क्षणभंगुर, कान्हा ने वो दिल तोड़ा।

(राधा कहती हैं)
"चलो छोड़ो कान्हा, मत करो विवाह, तनिक डालो मगर मुझ पर निगाह,
अंतिम क्षण में बिछड़न के, ना दो मुझको ऐसी सज़ा।"

देखा कृष्ण ने राधा को, तब वो कृष्ण ही रहे नहीं,
बन चुके थे राधा वो, राधा-कृष्ण दो रहे नहीं।

कृष्ण:
"ख़ुद से ही कैसे करूँ विवाह? ख़ुद में ही कैसे होऊँ प्रवाह?
राधा ही हूँ मैं, हे राधे! ये सत्य है, ना कोई अफ़वाह।"

 


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