परिभाषा नारी की – Delhi Poetry Slam

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परिभाषा नारी की

By Vinod Chadha

नारी क्या है

जब विधाता ने 
सृष्टि बनाई तो सोचा 
पृथ्वी पर 
नवसर्जन की 
जिम्मेदारी किसको दूँ
कौन है जो 
मेरा दायित्व यह संभाल सके 
कौन है जो 
कोमल नवजात को पाल सके 
कौन है जिसमें 
प्यार, मधुरता, 
कोमलता सब कुछ हो
सब्र, दृढ़ता, 
मानवता, सहनशक्ति भरपूर हो 

खरा उतरा जो 
विधाता के मापदंडों पर
विद्धमान थे 
यह सभी गुण 
जिस प्रभु की रचना में
नाम दिया उसे 
विधाता ने जन्म जननी का 
सौंप दिया 
दायित्व नारी को नवसर्जन का

तब से 
नारी करती आयी 
बिना रुके 
सेवा इस सृष्टि की
नौ महीने 
गर्भ में रखती 
अंश को भीतर अपने 
देती जन्म उसे फिर 
सह कर कष्ट शरीर पर अपने 

कभी कन्या, 
कभी बालिका
कभी बेटी, बहन कभी
कभी पत्नी, 
और माँ कभी कहलायी
समय समय पर 
रूप बदल 
सेवा जन मानस की करती आयी 

हे नारी 
हर रूप का तुम्हारे,
तुम्हारे सेवा भाव का
सम्मान हम करते हैं
हे जन्म जननी तुमको 
शत् शत् प्रणाम हम करते हैं  
हे जन्म जननी तुमको 
शत् शत् प्रणाम हम करते हैं ।।


1 comment

  • Thanks
    Delhi Poetry Slam, for selecting my poem and giving it a recognition.

    Vinod Chadha

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