मनुष्यता – Delhi Poetry Slam

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मनुष्यता

By Vikas Bajpai

एक दानव है यहां मानव सरीखा
सभ्यतागत दर्प में भी हीन दीखा
हर प्रयोजन को बनाता तुष्टिकर्ता
किंतु उसके बाद भी सर्वत्र तीखा

कंदराओं से निकल, व्योम के तल
सरल जीवन हुआ उत्तरोत्तर जटिल
फूस का छप्पर हुआ प्रासाद निर्मल
फिर स्वयंभू बन मिटाया श्रृष्टि लीखा

मांसभक्षण से कृषि की क्रांति तक
प्रसंस्कारित खाद्य जैसी भ्रांति तक
सभ्यतागत मूल्य यों फिर से गए चुक
इक मनुज ने दूसरे का मांस चीखा

निमिषभर में ध्वंस आतुर सभ्यता को
यदि बचाना है मनुज की भव्यता को
तो प्रकृति से भिन्न प्रवृत्ति त्याज्य होगी
और होगा थामना बापू का चरखा


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