मैं। – Delhi Poetry Slam

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मैं।

By Ulupi Panat

रातों में ढलती सुबह से बनती 
ऐसी कोई शाम हूं मैं।

सवालों में उलझकर जवाबों में सुलझकर 
किसी परिक्षा से निकला अंजाम हूं मैं।

आजादी को सेहता नियमों में बहता 
किसी बगावत का पैगाम हूं मैं।

पहने न्याय का सेहरा गाते अन्याय का लहरा 
किसी हाथ ने पकड़ी लगाम हूं मै।

इतिहास से समेटा भविष्य पर लपेटा 
किसी समय के वर्तमान का गुलाम हूं मैं।

कभी आस्तिक कभी नास्तिक 
किसी के विश्वास का कांपना सलाम हूं मैं।

धर्म की छाया अधर्म भी लाया 
किसी का सिख इसाई हिंदू या इस्लाम हूं मैं।

तूने बनाया तूने ही भूलाया 
किसी के अमानवीय कृत्य से बदनाम हूं मैं।

तेरा ये छल कर्म का फल किसी दिन जरूर देगा 
कहता सरेआम हूं मैं।


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