धर्म – Delhi Poetry Slam

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धर्म

By Tushar Rane

कोई इमारते थी
कोई रँगबेरंगी, कोई सफेद, कोई तराशी हुयी थी

हम अक्सर देखा करता थे
कुछ लोग उनमे इकट्ठा होकर गाया करते थे

बड़ा सुंदर और मधुर लगता था कानो को
और क्यों न लगे भाव जो गहरे थे

परन्तु गाने का राग किसी का कुछ तो किसी का कुछ था
कोई अध्नंगे, कोई पूरे ,तो कोई पैरो तक कपड़े पहनते थे

चेहरों पर तेज था ज्ञानी मालूम पड़ते थे
एक दिन जिज्ञासा वश हमने उनसे पूछ लिया था

यह कोनसी विधि, कोनसी तरकीब है, कोनसा method था
जो हाथ जोड़ कर, हाथ फैलाकर, साथ बैठकर करते हो

और इससे आप क्या समझते हो
जो अध्नंगे, पूरे कपड़ो वाले, पैरो तक कपड़ो वाले थे

वह कह गए हम अपना धर्म निभा रहे थे
कुछ भिखारी उन इमारतों के सामने बैठे थे

पसलियों से मास चिपका हुआ था, भूखे लग रहे थे
कुछ के कटोरों में आधी वो भी सुखी थी, कुछ के खाली थे

कुछ कुत्ते उनके पास आकर बैठे थे
वह भिखारी मूर्ख, अनाडी, अकल से पैदल लगते थे

आधी में से आधी भी कुत्तो को खिला रहे थे
पता नही यह मूर्ख क्या निभा रहे थे


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