हे! कृष्ण बचाने अब तो आओ – Delhi Poetry Slam

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हे! कृष्ण बचाने अब तो आओ

By Sweta Kumari

हे! कृष्ण कहां तुम सोए थे,
क्या मधुवन में तुम खोए थे
क्यों नहीं आए सुध लेने को,
क्यों नहीं आए दंड देने को,
क्यों ना लाज बचा पाए,
क्यों न चीर बढ़ा पाए?

क्यों आम अब ये पाप हुआ,
क्यों स्त्री होना अभिशाप हुआ
क्यों सुता की मां भयभीत खड़ी,
क्यों पिता की निजरें आक्रोश भरी,
कैसे रक्षा हो बहना की,
कैसे पहचान हो दुर्योधन की।

क्यों धृतराष्ट्र बने बस  बैठे हो,
क्यों संकल्प उठा कर ऐठे है,
क्या मौन नहीं धिक्कारे गा,
कैसे ये सच स्वीकारेगा,
क्या सिर्फ द्रौपदी पुकारी थी,
आज भी तो कितनी हारी थी।

 जब रो-रो कर सब हारीं थीं,
क्या इसमें भी मर्जी तुम्हारी थी,
सहसा ये प्रश्न उठे मन में,
पीड़ा का वेग उफने मन में,
हे !कृष्ण बचाने अब तो आओ ,
तुम हो अब भी,दिखला जाओ।

क्यों वचनबद्ध से दिखते हो,
शिशुपाल को माफ ज्यों करते हो,
अनगिनत हुआ अब कितना सहूं,
करो न्याय बस यही कहूं,
उस दिन ही शायद तुम जागोगे,
जिस दिन तुम सह ना पाओगे।

विश्वास मेरा अब डोल रहा,
कर प्रश्न तुझे मन तोल रहा,
किस भाषा में पुकारूं तुम्हें ,
कब तक बस निहारूं तुम्हें,
अब तो चक्र घुमा दो  तुम,
हो यहीं कहीं जतला दो तुम।


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