मंज़िल की खोज – Delhi Poetry Slam

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मंज़िल की खोज

By Swati Singh

एक पंछी राह भूल भटक गया,
पहुँच ना सका मंज़िल पर, दूर कहीं वो निकल गया,
याद कर के आशियाना अपना, देख रहा यहाँ वहाँ,
सोच रहा मन ही मन में, आगे अब जाऊँ कहाँ?

ऊँचाइयों से वो पेड़ छोटा सा लगता है,
जहां मैं रहता था, जाने क्यों वो अब नहीं दिखता है,
सूने हैं रास्ते, सूनी हैं गलियाँ,
ऊपर से सब कुछ वीराना सा लगता है।

बढ़ना है अब बढ़े चलो,
लौट कर अब जाऊँ भी तो कहाँ,
सोच रहा अब कुछ नहीं उसके बस में,
ना पीछे, ना आगे कुछ दिख रहा।

आँसू लिए आँखों में, दिल में ग़म का बोझ,
उड़ता रहा आसमान में, “अकेला हूँ” ये सोच।

काली है रात, अंधेरा फैला हुआ,
जाने कौन सा है रास्ता मेरा,
किस ओर जाऊँ, कहाँ मुड़ूँ,
ना कोई संगी ना साथी मेरा।

आख़िर कहीं तो होगा ख़त्म, ये फैला हुआ अंधेरा,
छलक रहा जो फ़लक से, ये बादलों का घेरा।
सब तो छूट चुका है, बचा नहीं अब और कुछ,
फिर से बनाना होगा एक नया बसेरा।

आँखों से जब आँसू गिरे, तो नज़र जैसे साफ़ हुई,
काली रात कटी, जैसे फिर से सुबह हुई,
दिख रहा सामने जो पेड़, जाने क्यों वो तो अपना सा लगता है,
पिछली रात जो बीती, तो सब सपना सा लगता है।

जो रास्ता ढूँढ रहा था, ये तो वही है,
जो आशियाना खो चुका था, पहुँचा फिर से वहीं है,
अब समझा वो, की ये अंधेरा राह भटकाने नहीं, राह दिखाने आया था,
“वो मंज़िल जो तू ढूँढ रहा है, तेरे पास ही है”, ये समझाने आया था।


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