प्रतिरोध – Delhi Poetry Slam

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प्रतिरोध

By Surya Kishore

मन में परिवर्तन का हठ, आँखों में रोष दिखता है,
असत्य में सच का आभास, सच में दोष दिखता है।
कौए को कोयल, कोयल को कौआ काला दिखता है,
दर्पण कोई न देखे यहाँ, यह दृश्य निराला दिखता है।

अल्पबुद्धि और अल्पज्ञान से गुत्थी को सुलझाएँगे,
समस्या समझेंगे नहीं पर समाधान बतलाएँगे।
युवा हमारा जागृत है, इसका प्रमाण दिखलाएँगे,
नारे बड़े लगाए नहीं तो निडर कहाँ कहलाएँगे?

उत्कंठित हो दशा तो, बंधु दिशा नहीं तब दिखती है,
जयचंद के माथे पर भी देश की चिंता दिखती है।
जब निश्चय हो, निर्णय न हो, मात्र क्रोध ही दिखता है,
सड़कों, गलियों, चौबारों पर प्रतिरोध भी बिकता है।

झूठ को इतनी ज़ोर से कह दो, सच्चाई बन जाएगी,
सत्य का तो न स्वर ऊँचा, न गति तीव्र हो पाएगी।
भ्रम से उपजी क्रांति, भ्रम और संशय ही फैलाएगी,
शोषण चारों ओर, हनन अधिकारों का दिखलाएगी।
सही-गलत की परख के श्रम की इच्छा ही मिट जाएगी,
अग्नि है विद्रोह की, कुछ तो भस्म करके ही जाएगी।

पक्षपात जब तटस्थता का पर्याय बन जाता है,
अर्धसत्य सर्वत्र है, दिखता पूर्ण सत्य छिप जाता है।
मिथ्याचारी जब शब्दों से जाल रचे भ्रम का, भय का,
सम्मानित और ज्ञानी होकर बीज रोप दे संशय का।
कठपुतली-सम वशीभूत जन स्वतंत्रता का गान करे,
मतभेदी को अल्पमति कह बुद्धि पर अभिमान करे।
जब अंधा बन कलियुग के संजय पर मन विश्वास करे,
भेड़-भीड़ का भागी बन मन झूठ में सच की आस करे।

लहू रक्त है, तन सशक्त, और मन में है आक्रोश भरा,
तानाशाही नहीं चलेगी, इसका है उद्घोष बड़ा।
अरे शूर हैं हम, शस्त्र उठाए पर आँखों पर पट्टी है,
साहस हो पर समझ न हो तो शिला नहीं, वो मिट्टी है।
इस मिट्टी से वज्र बना दें, हमें कौन सिखलाएगा?
शस्त्र तो हैं पर शत्रु कौन है, कौन हमें बतलाएगा?


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