ज़िंदगी – Delhi Poetry Slam

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ज़िंदगी

By Suresh Kumar Arora

ज़िंदगी तू भी कितनी अजीब है,
कभी हँसाती है तो कभी रुलाती है ।
भर के हसीन आँचल में अपने,
खुशियों का पलक पाँवड़ा बिछा
मन को कभी लुभाती है ।

छोड़ जाते हैं जब सभी तेरी राहों में अकेला,
मुझको एक तू ही तो अपनी नज़र आती है ।
सच कहता हूँ मान कर हमसफर तुम को,
तेरी सूनी राहों पर मैं भी बढ़ा जाता हूँ,
तेरी इन वीरान गलियों की यह तनहा ख़ामोशी
मुझे जीवन संगिनी से भी बढ़कर नज़र आती है

बढ़ते हुए किसी अलक्षित डगर की ओर,
इन नीबड़ पथों पर कोई हमराही जब मिल जाता है,
तन्हाइयों की सतत गहराई अंधियारी रात्रि के बाद,
खुशियों का नव प्रभात फिर से उमंग लता है।

पा कर सुकोमल प्रभात समीर का मधुर स्पर्श,
मन मृग-छौना लघु कली सा खिल जाता है।
तभी आता है वीरानियों का एक नया दौर,
जीवन का रंगीन सपना रेत महल सा ढह जाता है।

बिखर जाते हैं सभी निकट सम्बन्धी प्यारे,
पूर्व स्मृतियों का धूमिल अक्स मात्र रह जाता है।
आती है तब अतीत के मोहक लम्हों की याद,
ज़िन्दगी अंधियारी पथराई आँखों में ठहर जाती है।

कचोटता है फिर तन्हाइयों का उबाऊ सूनापन,
तब बस एक तू ही तो अपनी नज़र आती है।
ज़िन्दगी तू भी कितनी अजीब है!!!!!!
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