कुंभ – Delhi Poetry Slam

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कुंभ

By Sudipta Banerjee

गंगा के घाट पर आज चाँद सोया नहीं
देर रात जागता रहा, घूमता रहा वहीं कहीं।
घाट पर जलते अनगिनत दीयों से बतियाता रहा
कुछ उनकी सुनी कुछ अपनी सुनाता रहा।

फुसफुसा के कहानियाँ सुनाई गीली धोतियों ने भी
घिसी हुई चप्पलें भी आपबीती कहती रहीं
सहा ना गया होगा आसमान से
तभी तो धुंध नमी बनकर जमीन पर उतरती रही।

लौ से ज्यादा आस टिमटिमाती रही
ठिठुरन में भी आस्था झिलमिलाती रही
सक्षम और असहाय- दोनों यहां याचक थे
दृष्टा बनी त्रिवेणी आज खिलखिलाती रही।

गुफा, कंदरा, मंदिरों में जो दु:साध्य थे
वो देवता भी यहाँ उतरने को बाध्य थे
अघोरी , नागा , संत और सेवक का रेला यहाँ
मोक्ष का है कुंभ या कुंभ का मेला यहाँ ।

दृष्टव्य और अदृश्य की बीच की रेखा में
दृष्टा के ज्ञान और अदृश्य के संज्ञान में
मनके से परे मन में, देह से परे चित्त में
कुंभ तो स्थित है जीव में, त्रिवेणी है आँखों में

फिर भी पाप धोने को लालायित सभी
सूर्य और चंद्रमा को साक्षी मान डूबते रहे
कर्म का तराजू डोलता रहा
ग्रह नक्षत्र अपने अमृत अक्ष पर घूमते रहे।

क्या धुला कितना धुला ,यह प्रश्न अब भी जीता है
जो महाकुंभ का सार वही तो नारायण की गीता है
माटी धो धो सब गए, हीरे को धोया कितनों ने?
प्रत्यक्ष को पावन कर लिया ,परोक्ष को संजोया कितनों ने?


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