दस्तक – Delhi Poetry Slam

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दस्तक

By Srishyam Mangalasseri

दरवाज़े पर दस्तक...
अचानक लगा कि तू है।
सालों बाद,
वही ताल, वो तीन बार।

’यूँही बेपरवाह कदम रखो
मेरे कमरे में बिना खटखटाए,
तूफान का भी यही दस्तूर है’,
कभी मानी नहीं थी मेरी
हर रोज की चटचटाहट।
हमेशा दरवाज़े पर दस्तक,
वही ताल, वो तीन बार।

इतने साल बीत गए हैं,
इस दरवाज़े को ढूंढ आता रस्ता,
सूना–सा इस कमरा,
पीली किताबें,
पुराने दिनों की ख़ुशबू,
आलस में बिताई शामें,
कह गई बातों की ख़ामोशी,
अनकही बातों की गुंजाइश,
ग़म–भरे ग़ज़ल के नज़्में,
इज़हार न कर सके
मोहब्बत की रंगीन परछाइयां,
(ध्यान से देखो,
टूटी हुई चूड़ियों की टुकड़ों–सी
मिल पाएंगे उन्हें, अभी भी,
कोने में,
कमरे के, मेरे दिल के)
क्या याद करती होगी तुम,
खुद हमें भूल गई होगी तब।
जबकि सदा जगाकर
मेरी तन्हाई का एहसास,
हर एक चीज़ पर
तुम्हारी ख़ुशबू बाकी पड़ी है।

हजारों बार मेरे कमरे के दरवाज़े पर
दस्तक दी है तुम्हें,
पर एक बार,
एक बार मेरे दिल के दरवाज़े पर
दस्तक भी दी होती.....।

अब कौन आया होगा
जो तीन बार तुम्हारी ताल में
मेरे दरवाज़े पर दस्तक दी हो,
कहीं सचमुच तुम तो नहीं.....।


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