क्या हम हैं इंसान ? – Delhi Poetry Slam

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क्या हम हैं इंसान ?

By Shrikant Bourasia

देकर दुहाई धर्म की,
लेते बेजुबानों की जान ।
क्या हम हैं इंसान ?

करके बातें आज़ादी की,
करते कैद परिंदों की उड़ान ।
क्या हम हैं इंसान ?

कमाकर हर जगह मुनाफा,
ढूंढते मुफ्त का सामान ।
क्या हम हैं इंसान ?

खोले बिन तिजोरी दिल की,
चाहते बनना धनवान ।
क्या हम हैं इंसान ?

बढ़ाकर संबंध परायों से,
करते अपनों का अपमान ।
क्या हम हैं इंसान ?

विदा कर सबको अपने दर से,
बनते बिन बुलाए मेहमान ।
क्या हम हैं इंसान ?

करके मातम अगल-बगल में,
खाते मेवे और मिष्ठान ।
क्या हम हैं इंसान ?

दबाकर राज़ सारे अपने,
लगाते दूसरों में कान ।
क्या हम हैं इंसान ?

बनाकर तिल का ताड़,
लेते हाथों में तीर-कमान ।
क्या हम हैं इंसान ?

कुचलकर सैकड़ों सरों को,
बनाते अपनी पहचान ।
क्या हम हैं इंसान ?

छिपाकर हर सच को,
करते झूठ का गुणगान ।
क्या हम हैं इंसान ?

भरकर व्यभिचार तन-मन में,
जपते मुख से भगवान ।
क्या हम हैं इंसान ?

लगाकर अंकुश दिमाग पर,
करते अर्जित ज्ञान ।
क्या हम हैं इंसान ?

फंसकर भंवर में अतीत के,
बैठते भूल वर्तमान ।
क्या हम हैं इंसान ?

पढ़कर पोथी दुनिया भर की,
रहते खुद से ही अंजान ।
क्या हम हैं इंसान ?

समाकर खूबियां इतनी सारी,
कहते खुद को महान ।
क्या हम हैं इंसान ?


5 comments

  • हिंदी में पढणे का मजा कुच और है. आपकी पंक्तियों ने मेरे दिल को छू लिया!

    Rashmi Bansal
  • Wonderful lines reality of life..

    Harshita
  • Superb! Keep it up!! Proud of You!!!

    Satish Kulkarni
  • Brilliant, deep and emotional poem that connected within.

    Apoorva Ravi
  • Great!

    divya

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