एक कहानी – Delhi Poetry Slam

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एक कहानी

By Shivendra Singh

ये बस्ती है इज़्ज़तदारों की
यहाँ बेड़ियाँ ही दस्तूर हैं
ये बस्ती है बेजानो की

बड़े अरमानों से रंगी हैं बंदिशे शहर की हर दीवार पर,
बड़े नसीब से किसी को इतना भी काम मिला है।

काँटों से सजा रास्ता बीते दिनों का,
मंज़िल की चाहत बताते थे लोग,
फिर भी अपराध है।
नई पीढी बनाती भी कहाँ नये रास्ते,
घर न हो किसी का ऐसा कोना भी अपवाद है।

वादे हुए थे जिस चौक पे नई छतों के
ढकी है आज महलो की छाओ मे।
शिकन माथे की डाली है शिकायत मे,
बस कोई पढ़ने आ जाए गांव मे।

ये बस्ती है इज़्ज़तदारों की

हवस है इन आँखों मे मामूली हसरतों की,
मामूली समझ का है मामूली घुमान भी,
शर्म के पर्दे के पीछे हो शायद, ढूंढो
अफसोस की भी चादर कहीं

की जिसे बेटी कहा था अपनी कभी, कल किसी और की आबरू बता कर बेची कहीं
बड़े ऐशो ने नवाज़ा हैं इंहे किस्मत ने
पर बराबरी इनकी फितरत मे नही।

ये बस्ती है बेईमानो की।

बूढ़ी बातों मे है आज भी नफरत की आवाज़ मजबूत,
बूढ़ी हड्डियों की बात और रही।
तमाशा बनाया है इन्होंने ज़माने ता-उम्र
अब इस उम्र मे इनके इज़्ज़त के भत्ते कि बात और रही।

हर दिन का सच यहां दो रुपये मे बिकता है,
उसे छापने वालो के दाम की बातें और रही,
इस बस्ती मे आते हैं हुक्मरान हर मिजाज़ के,
हाँ यहाँ रिवाजों के रसूक की बात और रही।

ये बस्ती..


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