भय – Delhi Poetry Slam

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भय

By Shivam Chauhan

है भूत के ज्ञान में,
है आज की चाल में भी,
और भविष्य कि आश में।
भय सबमें है।

है बदलते रास्तों में,
है अकेले के सफर में,
है अज्ञात राह पर भी,
और छोटि सी डगर में।
भय सबमें है।

है आग कि ताप में,
है जल के दाब में,
है धरा की खाई में भी,
और आकाश कि ऊंचाई में।
भय सबमें है।

है प्रचंड तपस्वीयों में,
है समर के सूरमा में,
है प्यार के गीत में भी,
और सहज हर कामना में।
भय सबमें है।

है गृष्म कि लूह में,
है सावन कि आंधियों में,
है शीत के पाले में भी,
और वसंत के नवपल्लवों में।
भय सबमें है।

है हर जगह, हर काल में है।
है हर एक एहसास, हर इंसान में है।
भय सबमें है।

भय हममें उतना ही लिप्त है,
जितना है लिप्त हममें ईश्वर।
भय को किन्चित हमने है ख़ोजा,
पर भय ने है ख़ोजा ईश्वर।

भय को हमने इतना है ख़ोजा,
कि वह अपने हृदय में छिपा है।
जिस भांति  है छिपा,
हमारे हृदय में ईश्वर।

प्रायः ये दोनों साथ चलते,
फिर भी कभी ये हैं ना मिलते।
एक से दूजे का दमन हो,
पर किसी का अंत ना हो।

दोनों हृदय में वास करते,
न खोजें जाने पर उपवास करते।
साधना दोनों कि शक्ति,
दोनों से मनुज की आश लिपटी।

संग चलेंगे दोनों है सांस जबतक,
दृढ़ हो न करो एक पर विश्वास जबतक,
मानवीय क्षमता का अब तेज जानो,
अपने हृदय का खुद को स्वामी मानो।

दो शक्ति अपने इस हृदय को,
दोनों से ही आगे बढ़ संग्राम ठानों।
है महि पुरि ओर आकाश सारा,
खुद कि गर्जना को श्रेष्ठ मानों।


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