तो जवाब दे पाओगे? – Delhi Poetry Slam

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तो जवाब दे पाओगे?

By Shashwat Kumar

जो हाईवे पे चल दिया था
गाते लड़खड़ाते,
वो हाथ पकड़ के खींच लाए
चौक के उस किनारे,
जो रह टेढ़ी गलियों में
गया तेरे भटकते,
तो इशारा तक नहीं?

जो धूप तले सेक रहा था
मस्त मगन तन बदन,
वो पानी बाल्टी उलट दिये
सिर से पैर भिगो के,
जो बह अतल नदियों में
गया तेरे लहरते,
तो किनारा तक नहीं?

जो समय से लड़ पड़ा था
रे बुरबक बेधड़क,
वो क्षण में युग जिता दिये
सालों-साल सँवार के,
जो ठह एकाध लम्हों में
गया तेरे उलझते,
तो उबारा तक नहीं?

जो दहन में घूर रहा था
बस एकटक न डगमग,
वो हथेली से छुपा लिये
पलकों को सहला के,
जो खो तमस अंधेरों में
गया तेरे बहकते,
तो पुकारा तक नहीं?

वो मज़ाकिया ही मिज़ाज
कचर-पचर टटर-पटर,
जो अमृत सागर पी गया
बस चुप्पी लगा के,
जो रूह सूख के तरस गया
एक बस तुझसे हर्फ़ सुनने,
तो "बेचारा" तक नहीं?


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