परिपक्वता – Delhi Poetry Slam

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परिपक्वता

By Shashi Kala

आज फुर्सत से देखा खुद को आईने में,
एक नूर सा फैला था चेहरे पे,
बालों की सफेदी अब माथे पर झलकने लगी है,
पर फिर भी लगता है मेरी खूबसूरती और बढ़ने लगी है।
एक परिपक्वता सी
आई है मेरे व्यक्तित्व में, यही परिपक्वता मुझे भाने लगी है।
अब घबराती नहीं अंधेरों से मैं क्योंकि रोशनी तक मेरी पहुँच बनने लगी है,
यूं समझो, जैसे मुट्ठी में सितारे रखने लगी हूं,
और मुठ्ठी की दरारों से रोशनी अब बिखरने लगी है।
जिंदगी में जगमगाहट तो पहले भी थी,
पर अब जिंदगी रोशन सी लगने लगी है।
ये जो रोशनी और जगमगाहट की आई है परख, यही
परख, यही परिपक्वता मुझे अब भाने लगी है।
खामोशी से सुन लेती हूं सभी की राय,
पर करना वही है जो मेरे मन को भाए,
सोच मेरी ऐसी ही बनने लगी है।
सही- गलत साबित करने में अब उलझती नहीं मैं, शायद इसीलिए उलझने अपने आप सुलझने लगी है।
उलझने, सुलझाने का हुनर तो कल भी था मुझ में ,
पर आज तो जिंदगी ही सुलझी सी लगने लगी है। ये जो आई है परिपक्वता मेरी सोच में,
यही परिपक्वता मुझे अब भाने लगी है।
अब किसी हार पर मन नहीं घबराता,
पर खुशी हर जीत की मना लेती हूं, खुश होने के लिये खास पलों का इंतजार क्या करना,
यही सोच मैं साधारण पलों को भी खास बना लेती हूं ।
जिंदगी में खुश रहने का हुनर तो कल भी था मुझमें ,पर आज जिंदगी ही खुशनुमा सी लगने लगी है।
क्योंकि ये जो आई है परिपक्वता मेरे व्यक्तित्व में,
यही परिपक्वता मुझे अब भाने लगी है।
हां यही परिपक्वता मुझे अब भाने लगी है।


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