By Sharada Vishwakarma
मैं चुप रहूँगी।
तुम कुछ भी कहो,
फिर भी मैं चुप रहूँगी।
मेरे चुप रहने में ही सबकी भलाई है।
पर क्या मेरे चुप रहने में मेरी भलाई है?
सुना है जो चुप रहती है,
वो अच्छी बेटियाँ कहलाती हैं।
तो क्या मेरा चुप रहना ही मुझे अच्छा कहलाता है?
तो क्या मैं अच्छा कहलाने के लिए चुप रहूँ? क्या केवल अच्छा कहलाने के लिए चुप रहूँ ? मेरा चुप रहना तुमको अच्छा लगता।
मेरा चुप रहना सबको अच्छा लगता।
तो मैं भी क्यों ना अच्छी बन जाऊँ?
क्यों ना मैं सबसे अच्छी कहलाऊँ?
इस संसार में सब कुछ तो बोलता है।
ये नदियाँ, ये झरने,
ये हवाओं की सरसराहट,ये चिड़ियों की चहचहाहट।
संसार का कोना-कोना इनके कलरव से गूँजता है।
तो फिर मैं क्यों चुप रहूँ?
मैं भी तो प्रकृति का एक अंग हूँ।
प्रकृति के इन मानोरम दृश्यों के संग हूँ।
मैं भी क्यों ना उनके जैसी बन जाऊँ?
इन पक्षियों के संग मैं भी क्यों ना उड़ जाऊँ? इन नदियों संग मैं भी बह जाऊँ?
फिर क्यों न जाकर सिंधु में ही मिल जाऊँ?
जिसने मुझे बनाया उसी में खो जाऊँ।
क्यों ना मैं प्रकृति बन जाऊँ?
फिर से क्यों ना मैं प्रकृति बन जाऊँ?