अफ़सोस – Delhi Poetry Slam

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अफ़सोस

By Sankalp Srivastava

पापा की तस्वीर बनाने को
मैंने एक पेंसिल उठाई
स्केच बनाया पहले उनका,
चेहरे पर घनी मूँछ लगाई
जिम्मेदारी व धैर्य के रंग भरे और
प्यारी सी एक मुस्कान सजाई

रौबदार दो आँखें खींची,
आँखों को चश्मा पहनाया
पापा के मन को लेकिन
मैं हूबहू रंग न पाया!
पापा को गढ़ सकूँ मैं,
इतना बड़ा न बन पाया

न पाया ऐसा प्रभावशाली व्यक्तित्व मैंने,
न उनसे ऐसी बोलती आँखें मैंने पाई
आस ही लगाता रह गया उम्र भर,
कि काश मैं बन पाता उनकी परछाई

कहता है जब कोई, "मैं तुम्हें समझ सकता हूँ!"
हँसता हूँ मैं उसकी नादानी पर,
क्योंकि उनके जैसा मुझे कोई समझ सके,
ऐसी रचना ही ईश्वर ने नहीं बनाई

अफ़सोस कि मैंने खो दिया अब उनको
रोम-रोम मेरा अस्वीकारता ये सच्चाई
आकाश की ओर देखता हूँ होकर मैं विस्मित
हो कोई चमत्कार, और फिर से देने लगें वो दिखाई!

पुत्र मैं कैसा हूँ, यह उनसे जान न सका,
"वेल डन बेटा!" सुनने का अवसर उनसे माँग न सका
पर यदि बन सका मैं उनके जैसा पिता व इंसान,
समझूँगा कि उनकी ही विरासत है मुझमें समाई!

पापा, आज आपकी बहुत याद आई


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