By Sandesh Devkate
तुम उदास मत होना,
कि अब मैं किसी सूरज-सा ढल,
क्षितिज के पार चला जा रहा हूँ।
इस दिन की समस्त जीतें —
मैं तुम्हें सौंप,
समंदर की गोद में समा जा रहा हूँ।
इस जीत की ख़ुशी में,
ये उजास भरी शरवरी भेंट दे जा रहा हूँ।
इस शरवरी में,
मैं, तुम्हें — तुमसे मिलता जा रहा हूँ।
इस विच्छेद में,
सदा के लिए कोई मंदार खिले —
यह विनय मैं करता जा रहा हूँ।
अब मैं किसी और ब्रह्मांड के,
किसी और वासर को
प्रदीप्त करने जा रहा हूँ...
तो अब मैं जा रहा हूँ।