तो अब मैं जा रहा हूँ – Delhi Poetry Slam

तो अब मैं जा रहा हूँ

By Sandesh Devkate

तुम उदास मत होना,
कि अब मैं किसी सूरज-सा ढल,
क्षितिज के पार चला जा रहा हूँ।

इस दिन की समस्त जीतें —
मैं तुम्हें सौंप,
समंदर की गोद में समा जा रहा हूँ।

इस जीत की ख़ुशी में,
ये उजास भरी शरवरी भेंट दे जा रहा हूँ।

इस शरवरी में,
मैं, तुम्हें — तुमसे मिलता जा रहा हूँ।

इस विच्छेद में,
सदा के लिए कोई मंदार खिले —
यह विनय मैं करता जा रहा हूँ।

अब मैं किसी और ब्रह्मांड के,
किसी और वासर को
प्रदीप्त करने जा रहा हूँ...

तो अब मैं जा रहा हूँ।


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