रात की चुप्पी में आँसू – Delhi Poetry Slam

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रात की चुप्पी में आँसू

By Dr Sana Ali

चाँदनी की ओट में कोई रोता है,
चुपके से तकिये में चेहरा धोता है।
आसमान के तारों में दबी हैं सिसकियाँ,
जैसे किसी दिल की टूटी हुई कहानियाँ।

नींद की बाहों में जब कोई न सिमटता,
अंधेरे के आँगन में दर्द ही पनपता।
हर आहट में जैसे कोई पुकार हो,
खामोशी में भी एक तूफान सवार हो।

खिड़की से छनती ठंडी सी हवा,
जैसे कोई अनकहा राज़ सुना रही हो दवा।
आँखों के कोनों में चमकते वो अश्क,
किसी भूले हुए ज़ख्म को कुरेदते मश्क।

दिल की गलियों में सन्नाटा पसरा है,
जैसे किसी अपने का साया बिछड़ा है।
आँसू बहते हैं जैसे झरने का बहाव,
हर बूंद में छुपा है कोई नफरत, कोई लगाव।

रात के सन्नाटे में दिल यूँ ही तड़पता,
हर आह में जैसे कोई नाम बसता।
कभी कोई ख़्वाब, कभी कोई कसक,
रात की चुप्पी में आँसू ही है सच्चा सबक।


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