By Purvee Patwa
ज़रूरत नहीं तुम्हें किसी विशेष शारीरिक आकार की,
ज़रूरत नहीं तुम्हें किसी दुरुस्त भार की,
साड़ी तुम्हें ऐसे अपनाएगी कि तुम्हारे हर उभार पर वो एक अदा के साथ बैठ जाएगी।
जैसे नारी अपनाती है अपने जीवन के हर बदलाव को, वैसे ही तुम्हारे बदन के हर अंग को साड़ी अपनाएगी।
साड़ी वो वस्त्र नहीं जो नारी के अंगों को परदा दे,
बल्कि साड़ी एक ऐसा आभूषण है जो नारी के नारीत्व में और भी रंग भर दे।
लिपटती है नारी के तन से साड़ी, जैसे कोई उल्टा बहता झरना,
कमर की खूबसूरती को परिभाषित करती है साड़ी, मानो किसी अधूरी बात का विस्तार हो।
जैसे चमकती है नारी की पीठ साड़ी में, इंदु (चंद्रमा) के प्रकाश से भरी हुई।
नाफ-प्याला भी साड़ी पर नज़रबट्टू की तरह सजता है,
मानो कटि-प्रदेश का वह रखवाला हो जैसे।
नारी के लिए यह केवल एक लिबास नहीं, बल्कि उसका गुरूर है – साड़ी।
नारी के स्वभाव में सिमटा हुआ, उसका आभूषण – साड़ी।