सच झूठ – Delhi Poetry Slam

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सच झूठ

By Rohit Pangtey

जब सच सामने आता है
मन विचलित सा हो जाता है
झूठों संग रहने के आदि
अब झूठ हमें सुहाता है

झूठ में देखो नवाचार
कितनी किस्में कितने प्रकार
स्वानुकूल अति चाटुकार
भ्रम से सज्जित मोहक विचार

झूठ में दिखता इंद्रधनुष
सच कोरा ही रह जाता है
जब सच सामने आता है
मन विचलित सा हो जाता है

झूठ से बिगड़ी बात बनें
मेरे दिन उजले मेरी रात बनें
सर पे हाकिम का हाथ बनें
अपनी ऊंची औकात बनें

झूठ से होते काज सफल
सच हर सूं मुंह की खाता है
जब सच सामने आता है
मन विचलित सा हो जाता है

झूठ लुभाता यारो को
गैरो को ... रिश्तेदारों को
संतो को दुनियादारों को
घर की चारदीवारों को

झूठ से निस्बत बाकी है
सच सबको दूर भगाता है
जब सच सामने आता है
मन विचलित सा हो जाता है


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