एक अर्ज़ी चाँद को – Delhi Poetry Slam

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एक अर्ज़ी चाँद को

By Renu Ridlan

एक रोज़ चमकते चाँद की,
ख़्वाहिश हम भी कर बैठे,
आर्मानों की एक अर्ज़ी ले,
उस संग ज़िद पर अड़ बैठे।
तू यहाँ किसी महबूबा,
तो किसी के दिल का टुकड़ा है।
सुना है तुझ चाँद पर प्रेमियों का नगर बसा है।

देख मुझे वो पड़ा सोच में,
बोला, तू कोई भटका राहगीर लगता है।
प्रेम की इस नगरी में क्या तेरा भी कोई बस्ता है?

दिल के फ़क़ीर से लजाए,
दबे स्वर से बोले हम,
रह जाने दे हमें यहाँ,
जहाँ प्रेम का दरिया बहता है।
बता उजालों की इस बस्ती का, कितना भाड़ा लगता है?

सुन बात मेरी वो मुस्काया,
तू कोई भोला पंछी लगता है।
ना भूल उजालों की बस्ती पर, ग्रहण भी तो लगता है।

छिपा उजालों में यहाँ,
अंधकार बड़ा ही गहरा है।
प्रेमियों की इस नगरी में,
फ़रेबियों का संग डेरा है।

ख़्वाबों की इस दुनिया का,
दर्द से नाता गहरा है।
कहीं सुधा बन बहता प्रेम,
कहीं विष का दरिया है।

प्रेम की इस नगरी में,
रूप भी एक छलावा है।
रूह के इस बंधन में,
जिस्मों का मान ज़्यादा है।

किसी मोड़ जुदाई यह प्रेम,
कहीं मिलन बन जाता है।
कहीं तपस्या बन बैठा,
कहीं यह छल कर जाता है।

अनोखा यह प्रेम यहाँ,
रीत ग़ज़ब निभाता है,
अमावस्या की चाह में,
यह चाँद खुद ही मिटता जाता है।

अनमोल मेरी इस दुनिया का,
मोल बड़ा निराला है,
कई उम्रें गवानी पड़ती हैं, बस एक उम्र बिताने के लिए।

दे मोल मुझे वो सब,
तुझ में जो कुछ तेरा है,
ख़्वाब, हठ, उम्मीदों का यह चोला,
यहाँ तूने क्यों ओढ़ा है?

वही यहाँ बस रह पाया,
जिसमें कुछ और न शेष बाकी,
बस समर्पण गहरा है,
बस समर्पण गहरा है,


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