दस्तूर दुनिया का – Delhi Poetry Slam

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दस्तूर दुनिया का

By Ramesh Prasad

ईद उनकी, क्रिसमस उनका और उन्ही की होली है।
ख़ुदाई उनकी ही है, जिनकी लाठी है, जिनकी गोली है।

सब जानते हैं कि वो आलीशान महल किसका है।
किसको मालूम है कहाँ उसके कारीगरों की खोली है?

है आबरू उनकी, जिनका है ख्वाबगाह, और  हरम है जिनका।
उनकी अस्मत ही कहाँ, जिनकी सलवार नहीं और ना चोली है?

यूँ तो क़ायनात में खयालातों पर इख़्तियार है सबका।
महज़ तब तक लेकिन, जब ना नज़र है और ना बोली है।

पत्थर फेंककर मुखलिसोँ पर इस जहान में रोजाना ।
दीवाना और पागल पुकारता बेईमानो की टोली है।

खबीसों के घर से निकलते हैं, जनाज़े भी निकाह की माफिक़ ।
शरीफों की शादियों में भी सजती कफ़न की डोली है।

वही पुराना प्याला है, और जाम भी है वही क़दीम ।
पिलाने वालों ने बस जमहूरियत की औहाम घोली है।


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