संकल्प – Delhi Poetry Slam

संकल्प

By Rajesh Kumar Singh

हम जहाँ हैं,
वहीं सॆ ,आगॆ बढॆंगॆ।

हैं अगर यदि भीड़ मॆं भी , हम खड़ॆ तॊ,
है यकीं कि, हम नहीं ,
पीछॆ हटॆंगॆ।

दॆश कॆ , बंजर समय कॆ , बाँझपन मॆं,
या कि , अपनी लालसाओं कॆ,
अंधॆरॆ सघन वन मॆं ,
पंथ , खुद अपना चुनॆंगॆ ।

और यदि हम हैं,
परिस्थितियॊं की तलहटी मॆं,
तॊ ,वहीं सॆ , 
बादलॊं कॆ रूप मॆं , ऊपर उठॆंगॆ।


1 comment

  • Very nice poem

    Digvijay Singh

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