मैं जितनी बड़ी हो रही हूं – Delhi Poetry Slam

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मैं जितनी बड़ी हो रही हूं

By Purba Banerjee

मैं जितनी बड़ी हो रही हूं
मेरी सोच उतनी छोटी हो रही है।

मेरी नज़र भी जैसे कमज़ोर सी हो गई है,
ऊंचाई को माप नहीं पाती हूं,
गहराइयाँ भी धुंधली सी लगती हैं।

ख़्वाबों के बीज बनने से पहले ही
पलके झपक जाती हैं मेरी।

मंज़िल का रास्ता आते ही
पैर कपकपाने लगते हैं मेरे।

अब तो फिसलने से भी चोट ज़ेहन में रह जाती है।
सोचती हूं,
जहां हूं वहीं ठीक हूं,
क्यों मौके तलाशूं?
ख़ुद को जोखिम में क्यों डालूं?

मैं जितनी बड़ी हो रही हूं,
शायद मैंने बढ़ना ही छोड़ दिया है।


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