जीवन की डोर बंधी स्वयम से – Delhi Poetry Slam

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जीवन की डोर बंधी स्वयम से

By Priyanka Ailawadhi 

जीवन की डोर सिर्फ़ प्यार से ही बंधी है
धरती पर सिर्फ़ माता-पिता ही थे,
बचपन से किशोरावस्था तक,
किशोरावस्था से युवावस्था तक
उन्होंने ही सारी ज़रूरतें पूरी कीं
लेकिन आँसुओं की डोर सिर्फ़ प्यार से ही बंधी है?

साथियों के साथ, मुझे आज़ादी मिली,
प्यार ने एक नई दुनिया सजाई,
ज़िंदगी के नए पड़ाव में, प्यार ने मुझे खूब हँसाया।
लेकिन आँसुओं की डोर सिर्फ़ प्यार से ही बंधी है?

बच्चों के साथ, मुझे अपना बचपन एक बार फिर याद आ गया,
उनकी शरारतों में, मैं ख़ुद को भूल गया।
उनके लिए जीते हुए, मैंने उनकी महत्वाकांक्षाएँ पूरी कीं।
लेकिन अकेलेपन की डोर सिर्फ़ प्यार से ही बंधी है?

मैं ख़ुद को ऐसा बनाना चाहता हूँ कि
दिल झूठ न बोल सके
सिर्फ़ एक ही परत का ज़ोर न हो,
दिल में कोई प्रतिस्पर्धा न हो।

सिर्फ़ मैं और तू का ज़ोरदार नारा हो।
किसी की चाह न हो,
किसी का डर न हो।
कुछ भी ज़ाहिर करने का जुनून न हो,
मिलने की शर्म न हो।
अगर मैं ऐसा बन जाऊँ, तो शायद मान लूँ,
कि जीवन की डोर सिर्फ़ प्यार से ही बंधी है।


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