डर और चाह – Delhi Poetry Slam

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डर और चाह

By Priyan Dixit

डर है कि मैं कोई याद न खो दूं,
कोई पुराना एहसास न खो दूं।

जो भी आए क़रीब मेरे,
उनमें से किसी का साथ न खो दूं।

दिल में जो ज़िंदा रखा है बचपन,
उस बचपन में खेला कोई खेल न खो दूं।

जिस राह पर चलूं, उस राह पर फूल आ जाएं,
और जो भी हों कांटे, उनको मैं खो दूं।

जो भी है मेरा, उसे साथ मैं ले लूं,
और जो भी हो इनायत, उसको मैं खो दूं।

यही कहीं था गांव मेरा...
पक्की सड़क के किनारे आ गया होगा,
यहां एक पेड़ था,
उस पे लगा वो आम न खो दूं।

कोई मेरी शिकायत करे, मगर किससे?
मैं किसी “बड़े” के होने का एहसास न खो दूं।

कभी कोई ऐसा मुझसे मिलने आए,
कि वक़्त का हिसाब मैं खो दूं।

दिन मेरे आगे खड़ा था, रात मेरे पीछे...
और मैं शाम की होकर —
दिन-रात को खो दूं।

जो माँगी है मैंने, ना जाने किससे —
वो दी हुई आज़ादी न खो दूं।

ये खोने के डर और पाने की चाह में,
जो अभी है मौजूद — उसको न खो दूं।


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