तुम्हारा स्कंध – Delhi Poetry Slam

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तुम्हारा स्कंध

By Priya Sufi

कहां से शुरू करूं
तुम्हारी जय यात्रा
किस कोण पर कलम धरूं
हर अंग प्रत्यंग विजय स्तंभ है
किसका वरण करूं
सर्वप्रथम वो स्कंध...
जिन पर चिबुक धरने की
साध लिए गुजारी हैं
कितनी ही सदियां...
कितना मोहक है
उसका हर कटाव
जैसे हिमालय का कोई ओर छोर
जिसके पीछे मिलता है
सूरज को ठांव हर शाम
और आगे से रचता है चांद
हर रात चांदनी का गांव
यह स्कंध
जिस पर पांव धर
तुम्हारे वरिष्ठ
करते हैं पार संसार
जिस पर उठा रखी है तुमने
सभ्यताओं की गांडीव
और संस्कृतियों का समस्त भार
उसी स्कंध पर
कैसे टांग लेते हो इच्छाओं का
भोला सा झोला
और निकल पड़ते हो
हर सुबह मंदिरों की प्राचीर
और बाव की भूल भुलैया में
खोजने किसी भूली हुई
सभ्यता के प्रमाण
सोचती हूं अक्सर
कभी किसी रोज़
तुम बैठो गे उस झील के किनारे
करने कुछ विश्राम
या फिर सोचने
नया अनचिन्हा कोई काम
बस उसी वक्त
उस अवकाशगत स्कंध पर
टिका कर सर
बैठूंगी पल दो पल
लूंगी उस अज्ञात पल में
हिमालय का सानिध्य
सुनूंगी इच्छाओं के सुंदर वन की
चिड़ियों की गुन गुन
और पढूंगी तुम्हारा मन
मेरी असंख्य साधों के
अंतरीप सहेजे
तुम्हारा स्कंध...!


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