कब्र पर खिलते फूल – Delhi Poetry Slam

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कब्र पर खिलते फूल

By Preeti Chauhan

मेरे केसों में में तहज़ीब, मेरे कंधों में तहज़ीब, मेरे पेट में तहज़ीब, मेरे पैरों में तहज़ीब
कहते हैं वो इस बोझ के तले मैं जाऊंगी अपना अस्तित्व भूल, लेकिन कहानी कुछ और ही बयां करते हैं मेरी कब्र पर खिलते फूल ।
मुझे इन्ही केसों से खींच, घसीट के ले जा, टांग दे चौराहे पर बंदूकों के सैलाब के बीच
और जो मेरी सांसे उखड़ रही है तो हंसते हैं चंद चेहरे
कहते हैं देख अब हो रही है तू धूल
लेकिन कहानी कुछ और ही बयां करते हैं, मेरी कब्र पर खिलते फूल।
सुना है अब दुकानों पर क्रांतिकारियों का मांस बिक रहा है , जो जीवित हैं चौराहों पर उनका श्वास बिक रहा है
जख्म हो गए हैं मरहम से कोसों दूर, लगेगा उन्हें कि अब इनकी हिम्मत गई है टूट, लेकिन कहानी कुछ और ही बयां करते हैं मेरी कब्र पर खिलते फूल।
माथा लहू से भरा है, चेहरा आधी अधूरी पट्टियों से सना है, आंखों में आंसू हाथों में क्रांति ध्वज और होंठों पर आजादी के गीत , एक आंदोलन सोया समाज जगा रहा है
फिर भी जाने क्यों लगता है उनको कि हमारी किस्मत गई है रूठ , लेकिन कहानी कुछ और ही बयां करते हैं मेरी कब्र पर खिलते फूल।
अब लिखूंगी तो सोच लिया है विनाश लिखूंगी
खोज खबर नहीं अब कोई सीधा पाश लिखूंगी
प्रवाह तेज हो चाहे जितना भी जल का ,अब ये तथ्य न होंगे धूल
क्योंकि कहानी कुछ और ही बयां करते हैं ,मेरे कब्र पर खिलते फूल
क्योंकि कहानी संघर्ष, संवेदना और सम्मान की बयां करते हैं मेरे कब्र पर खिलते फूल ।


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