मौन पुकार – Delhi Poetry Slam

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मौन पुकार

By Pankaj Kumar Gupta

मैं डूबता रहा
भीड़ के शोर में
जहां हर चेहरा मुस्कान की नक़ाब पहनकर...
तालिया बजा रहा था।

मेरी सांसे
कांच पर बुलबुले सी
धीरे धीरे फिसल रही थी
बिना आवाज
बिना किसी उफ्फ के।

किसी ने देखा तक नहीं
कि मेरी आंखों के किनारों पर
थमा हुआ समंदर है
जिसे मैं अकेले ही सहेज रहा था।

मेरी अंतरात्मा ने देखा
उसने सुनी थी
मेरी मूक पुकार
मेरे तैरने की लय
मेरे थकान की थाह।

भीड़ के बीच वह कूद पड़ा
अंतरात्मा का अंतर्मन....
पानी में भीग गया
लेकिन उसने
मेरी धड़कनों को
गले लगा लिया।

मुस्कुराते हुए
हम दोनों बाहर निकले
सोचा था
तालियों से स्वागत होगा...
मगर तालियों की जगह
हमने सुने 'लांछन'
अपवित्र होने का
मर्यादा को तोड़ने का।


1 comment

  • उम्दा कविता,उम्दा कवि के द्वारा।
    हृदय की डूबती-उतरती भावनाओं की अदभुत अभिव्यक्ति।बेहतरीन

    अमित कुमार सिंह

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