अंतर्द्वंद्व – Delhi Poetry Slam

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अंतर्द्वंद्व

By Neha Sharma

अंतर्द्वंद्व ये कैसा है?
उम्रभर का फेरा
जितना सुलझाओ ,उतना उलझे
चकव्यू सा कोई घेरा 
बढ़ता, घटता , या शून्य कभी
जैसे पूर्णिमा के बाद अंधेरा
मन का साथी ये अटूट है
छूटे ना उसका बसेरा ।
जलती लौ सी तपिश है इसमें
खुद ही जलाए, पीटे,बनाए
बन बैठा देखो ठठेरा 
उड़ान भी दे ,दायरे भी बनाए
ज़मी से अब्र तक इसका डेरा 
खुद को कोसे, सफ़ाई भी दे
मुद्दई बना ये खुद का
क्यों बंदिशों ने ऐसा घेरा ?
उल्फत मे उलझे, रंगिशों में सुलगे
अजीब सी इस कश्मकश में 
खुदी को  इसने उधेड़ा ....
पर,
ज़िंदगी के दोराहे पर, जब धुंधला हर नजारा था
कोई नहीं था साथ ,और मैं सब कुछ हारा था

लोगों ने सिर्फ मेरे शब्दों को पकड़ा था
तोड़ कर, मरोड़ कर ,खुद की भाषा में बदला था

दुआओं का सिला असर ना दिखाया था
संसार के चकव्यू को, भेदना मुश्किल पाया था

कांटों में घिरा जब, खुद को पाया था
दाव पेंच में उलझा था,अस्तित्व डगमगाया था

परेशानियों में घिरा था, जब संगत में धोखा खाया था
जो कहते थे, हम साथ हैं, उन्होंने ही भरमाया था 

दिल टूटा था मेरा, जब खुद को संभाल ना पाया था
समक्ष पूरा जीवन था,जिसको जीना ना आया था

तब,
ज़िंदगी चलने का नाम है, 
ये पाठ खुद को पढ़ाया था
ठोकरों से संभलकर, 
खुद का मार्ग प्रशस्त कराया था 
अंतर्द्वंध से लड़कर,
खुद में तपकर,
सोने सा निखरकर, 
मैं उभरकर, फिर से जगमगाया था
मैंने खुद को फिर से जीना सिखाया था!!


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