माँ – Delhi Poetry Slam

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माँ

By Neha Rajoria

अज भी बहुत खुश हो जाती हूँ
जब साड़ी पहन कर इतराती हूं
और फट से कोई ना कोई बोल देता है
बिल्कुल अपनी माँ जैसी लगती है।   

कभी नहीं भूलूंगी मैं 
वो तेरा दिन भर घर संवरना
और हम तो हम हैं
हमको तुझे वो गुस्सा दिलाना।   

पिटे भी बहुत और हँसे भी बहुत
फिर तेरा वो कहना
पढ़ लो, कुछ बन जाओ जिंदगी में
दिन भर दांत दिखाने से कुछ नहीं होगा।   

सही में मा, वो दिन याद आते हैं
सीख तो बहुत कुछ गए
लेकिन प्रैक्टिकल में फेल हो जाते हैं
कैसे कर लेती थी तुम वो सब कुछ।   

उस पर भी तुम्हारा हमें समझाना
रिश्ते नाते और उनकी गहराइयां
और कितनी ही थकी हो, होली की वो गुझिया 
और दिवाली का वो लज़ीज़ खाना।   

पलक झपकते जैसे बड़े हो गए हैं
घर बदल गया, नये रिश्ते जुड़ गये
जो नहीं बदला है, वो तेरा अब भी समझना
रिश्ते नाते और उनकी गहराइयां।   

समझती हूँ मैं माँ ये सब 
लेकिन जो नहीं समझ आता वो ये 
की में तो सिर्फ बेटी थी ना
तो इतने रिश्ते संभालूं कैसे ।   

थक सी गई हुं
हर पल एक नया रिश्ता जीते जीते
और उसमें इतना खो गई हूं
की अपना छोढ, तुझको भी भूल गयी हूँ।   

पढाई तो अच्छे से करी थी माँ
कमी कहां रह गई पता नहीं
जिस इज्जत की उम्मीद थी रिश्तों से
वो भी वक्त के साथ ही गुजर गई।   

अब तो कभी दिन भर थकती हूं
तेरे उस हाथ को याद कर लेती हूँ
जो तू माथे पर रखती थी
और सारी टेंशन गुल हो जाती थी।   

अब जब पीछे मुड़कर देखती हूं
सही हम नहीं और गलत तू भी नहीं लगती
लेकिन एक बात तो सीखी है 
पहला रिश्ता खुद से, फिर जमाने से।   

सच मा, बहुत याद आते हैं
वो तेरे साथ बिताये सारे पल
तुझ जैसी थोड़ी भी बन पाती तो
बस अब लिखना नहीं है। 


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