वक़्त बदलता है – Delhi Poetry Slam

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वक़्त बदलता है

By Neha Kumari

उम्र के पड़ाव से
आदमी हर वक़्त लड़ता है
जैसा भी हो,
वक़्त बदलता है।

खोजती निगाहें
मन की शांति का एक कोना,
कैसे समझाऊँ उसे
कि मुश्किल है
एक उम्र के बाद ये होना।

मेरे सामने से गुज़रता है
जैसे छोटे बच्चे की तरह,
चिढ़ा कर—
कि तू इंतज़ार ही कर, मैं तो निकलता हूँ...

जिस जहान में जादुई नहीं होता कुछ,
न जाने क्यों इंसान उम्मीद चमत्कारों पे करते हैं...
हर रोज़ नीचा दिखाने वाले समाज में
वो तालियों की गड़गड़ाहट ढूँढते हैं...

जो बदल सकता है सब कुछ—
वो बस उसका अंतर्मन है।
बाहर धूप सुहानी है,
पर जागने की फ़ितरत अब पुरानी है...

जवानी—उम्दा ख़्यालों का एक सुंदर महल है,
बचपन—मासूमियत की एक चादर,
बुढ़ापा—अनुभव का पूरा घर।
पर इन सब में कहीं फँसी पड़ी हूँ मैं—
न मासूमियत बची है, न ख़्याल बुन पाती हूँ,
न अनुभव तक पहुँचने की अभी है उम्र मेरी...

मैं बीच के किरदार में फँसी हुई वो इंसान हूँ
जो महज़ 25 से ऊपर है और 55 से नीचे,
जो समझ से पीछे है और हिम्मत से खाली...
हाँ, सच है ये...
कोई बहुत आशावादी बातें मुझे नहीं बदलती,
न मुझे भाती हैं...

मैं कोशिश रोज़ करती हूँ आगे क़दम बढ़ाने की,
और फ़ितरत मेरी
मुझे फिर वहीं खड़ा कर जाती है...


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