गुरु की लालटेन – Delhi Poetry Slam

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गुरु की लालटेन

By Naman Kedia

जब निकला मैं अंदर के सफ़र पर,
अंधेरों ने स्वागत किया वासना के गुलाबों से।
गुरु की लालटेन जो ना होती,
ना चढ़ पाता मैं सीढ़ियों के उन क्षणों से।

चाह से न खरीदी गई सूरज की रोशनियां,
माया ने सजाया जो थाल,
ममता के आँसू भी न बुझा सके वो सवाल।
काल की नाव में वक़्त का हिसाब यूं हुआ,
जैसे हवा पिंजरे से छूट चली हो।

कुछ कदमों में ही राख की चोटियों ने दी वो रौशनी,
रौशनी, जिसमें छुपा था मौन।
मौन ही था सत्य, मौन ही थी राह,
जहां शब्द चुप थे, वहां अनंत था पास।


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