मेरे घर के पास का चौराहा (कोविड के टाइम) – Delhi Poetry Slam

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मेरे घर के पास का चौराहा (कोविड के टाइम)

By Nadia Makharia

गाड़ियों की आवाज़ों से
शाम को तो चटखारों से
रोशन होता था जो
एकदम शांत, गुमसुम हो गया है वो


बच्चों का आना जाना
मांओं का आवाज़ लगाना
कभी स्कूल छोड़ने जाना
कभी स्कूल से ले कर आना
हमेशा अशांत रहता था जो
आज कितना ध्वनि विहीन हो गया वो


शाम को सेवपूरी, भेलपुरी
ऐसी खुशबू से नहा जाता था वो
भैया थोड़ा तीखा, थोड़ा मीठा
अरे,जैन बोला था मैंने, आलू नहीं
स्वाद ही निराला है इनका
चटोरों से भरा रहता था जो
बेस्वाद, बेजान हो गया है वो


इसने भी ना सोचा था कभी
कोई पुलिस कोई नेता
इसकी रौनक,इसका चहकना रोक पाया
आज कैसे थम गया, उफ क्या ये ही है वो
आओ वापस, राह ताकता है हमारी वो
अपने आंसू तो बहा भी ना पाए वो
मेरे घर के पास का चौराहा है जो।


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