स्मृति – Delhi Poetry Slam

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स्मृति

By Mona Rawat

मैं जीत गई
या हार गई?
मैं पल भर में ही वार गई,
उसकी गंगा सी आंखो में
डुबकी लेते ही तार गई।

मानो तो जलधारा था,
मेरी आंखों का तारा था,
उसकी चंचल बातों के बिन,
जीवन मेरा खारा था।

जिसकी नर्म त्वचा को छू कर
आंधी भी रुक जाती थी,
ऐसी निश्चल मनोभूमि के बिन
जीवन रुकती धारा सा था।

दुःखी रहे क्यूं व्याकुल ये मन,
उसकी शीतल छाया के बिन,
मैं धूप कड़क हूं झेल रही
उसकी मधुवन काया के बिन।

हो गया अमर गर नाम प्रेम का
अर्थ कहां रह जायेगा?
प्रेम वहीं खामोश रहे जो,
विफल हुआ तो पूजा जाएगा।


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