संघर्ष बनो तुम – Delhi Poetry Slam

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संघर्ष बनो तुम

By Meenakshi Bhatnagar

कविता तुम्हें तलाशती हूं 
हर एक संभावना में
खुशनुमा पलों की सरगम
अनाचार अत्याचार के विरुद्ध
मौन चीख़ों की आवाज बनो
कविता ! हर पल का संघर्ष बनो तुम

युद्ध की विभीषिका
देश में ध्वस्त शहरों के मध्य
करुणामई मन की पुकार
मानवीयता का प्रतीक बन
जग का हंसी उजाला हो जाओ
कविता ! हर पल का संघर्ष बनो तुम

इतिहास गवाह है
विकास की दरें
विनाश की सरगर्मियां
कराहता हुआ गूंगा अंधेरा
खूनी साजि़शें
इन सब में एक किरण बो देना
करो आशाओं की खेती
कविता ! हर पल का संघर्ष बनो तुम

अदालतों की खिंचती तारीख़े
टूटते एतबारों की किर्चियां
जब घायल हो पीड़ित की आत्मा
और अभियुक्त हो जाते रिहा
जस्टिस बीइंग डिनाइड की
बेबसी को हराती
उम्मीद की एक लौ बन
कविता ! हर पल का संघर्ष बनो तुम

सवालों के कटघरे में
शर्मसार हो
सच जब सर झुका ले
जब हर शातिर झूठ
उसे हराने को
हो खड़ा कटिबद्ध
तुम झगड़ालू ज़िद बन जाओ
कविता !हर पल का संघर्ष बनो तुम

ध्रुवों पर पिघलते
ग्लेशियर का दर्द
कटते अरण्य वन
उनसे आश्रयहीन हुए बाघ
आदिवासियों की बेबसी ,बेकसी से
दग्ध हृदय में शब्दों से
खड़ा कर देना एक चक्रवात
साहस की मिसाल रचो
कविता ! हर पल का संघर्ष बनो तुम

लचर व्यवस्थाओं के खिलाफ
एक शंखनाद करो
सिर्फ प्रीति का ममत्व का ही नहीं
एक क्रांति का अंगार बनो
बन जाओ मशाल तुम
कविता ! हर पल का संघर्ष बनो तुम


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