मन की बात – Delhi Poetry Slam

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मन की बात

By Mannaa Bahadur


जो बोले ना, ख़ामोश रहे,
उसके मन में भी बातें हैं।
जो देख न पाए आँखों से,
उन पलकों में भी सपने हैं।
जिसकी राहों में काँटे हों,
वे भी मंज़िल को तकते हैं।
जिनकी पाँखों में दम ना हो,
उड़ने की हसरत रखते हैं।
सावन में जी भर भीगा हो,
वो प्यासा भी हो सकता है।
हर महफ़िल में जो छाया हो,
वो तनहाँ भी हो सकता है।
तुम समझो उनकी मजबूरी,
फिर कौन चहक कर ना गाए?
उनके सपनों को पहचानो,
फिर कौन कली ना मुस्काए?
थोड़ा सा सहारा मिले अगर,
आकाश चढ़े कमज़ोर लता।
थोड़ा विश्वास कोई दे दे,
फिर कौन जो जीना ना चाहे?
थोड़ी सी धूप अगर दे दो,
जंगल में भटके राही को-
कितने सूरज हाथों में ले,
वो ढूँढ ही ले अपनी राहें।
थोड़ा सा प्यार जो तुम दे दो,
मैं सागर को मीठा कर दूँ।
औ नफ़रत है जिन सीनों में,
उनमें उल्फ़त के सुर भर दूँ।


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