By Manisha Amol
ऐसा क्यूँ?
अनजान सफ़र है जीवन का
जाना सबको है उस पार,
अपनों का हाथ थामकर
कर के सपनों को साकार,
विह्वल हो भाग रहें हैं सब
न पता-ठिकाना न आधार,
इस कठिन पहेली का
न सरल समाधान न सार।
ये प्रश्न पूछती हूँ मैं खुद से,
कि आख़िर होता ऐसा क्यूँ ?
कालचक्र की अविरल चाल
गति अग्रसर है पूर्वनिर्धारित,
सूर्योदय हो या हो सूर्यास्त
मिलन हो चाहे दिन और रात,
मौसमों का रंग रूप बदलना
हर पल बीतते वक़्त के साथ,
सावन की हो हरियाली
या हो पतझड़ की सौग़ात।
कुदरत के इस चक्र का
मन में ये सवाल फिर क्यूँ?
अनसुलझी पहेलियों का
कोई सिरा न मिल पाना,
अनगिनत उठते प्रश्नों का
मनवांछित उत्तर ढूँढ न पाना,
धरती से दूर क्षितिज के पार
अंजाने जहां को तलाशना,
वर्तमान क्षण में न रह कर
भविष्य की चिंता में डूबना।
इंसान के इस फ़ितरत का,
सिर्फ़ ये मिसाल फिर क्यूँ?
तन खड़ा नदी के इक किनारे
भटकता मन उस पार नदी के,
धरती पर न पाँव जम रहे
तकते रहना यूँ आसमां पे,
ठौर नहीं अपनी ख़ुशी का
रखना हिसाब ग़म का औरों के,
बदहवासी में बढ़ते रहना
प्रतिस्पर्धा के राह अंधे पे।
ख़ाली हाथ हर व्यक्ति का,
है अहंकार मन में फिर क्यूँ?
दूसरे क्यूँ चयन करते
किसी और के जीवन राह को,
मनोकामना उसकी कर वंचित
उसकी ज़िंदगी की हर चाह को,
हो जाओ समर्पित और संकल्पित
ईर्ष्या भाव से कर लो दूरी,
इस सत्य की अथक तलाश में
न तू पहला न तू आख़री।
कर्म फल पर रख विश्वास,
मन में ये विचार फिर क्यूँ?
ये प्रश्न पूछती हूँ मैं खुद से,
कि आख़िर होता ऐसा क्यूँ ?