बैरागी हूं – Delhi Poetry Slam

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बैरागी हूं

By Manish Rathore

सीधी सच्ची सी राह है।
किसी की भी ना आह है।
अगर रोशनी का न साथ है।
तो भी फिक्र की क्या बात है।
बेदाग होकर भी दागी हूं।
मैं महफ़िल में बैरागी हूं।
मैं महफ़िल में बैरागी हूं।।

तू राख ना समझ मुझे,
मैं बुझ के भी शरार हूं।
इक फूल था जो खार हूं।
पर रहता अब बेकरार हूं।
फितरत से ही बागी हूं।
मैं महफ़िल में बैरागी हूं।।

तू ना समझ की अकेला हूं मैं।
जब जरूरत पड़े काफिला हूं मैं।
मुझे दामन ए दाग की फिक्र नहीं।
कीचड़ में पहले भी खिला हूं मैं।
विरोध झेलने का तो आदी हूं।
मैं महफ़िल में बैरागी हूं।।


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