वो रास्ता – Delhi Poetry Slam

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वो रास्ता

By Kunal Punj

बैठे बैठे एक ख़याल दिमाग़ में आता है
एक अनकहा अनसुना रिश्ता और भी है जिसकी याद दिलाता है ।
इस बार बात इंसानों की नहीं कर रहा, ये बात है उस रास्ते की जो मेरे घर की ओर जाता है ॥
वो रास्ता जो मेरे घर कि ओर जाता है, उम्र के इस पड़ाव में भी मुझे बाँहें खोले बुलाता है ।
ज़िंदगी की कश्मकश में जो दास्तानें मैं भूल जाता हूँ, आज भी उनका एक एक पन्ना पढ़ के वो मुझे सुनाता है ॥
जिस पे चल के बड़ा हुआ, साइकिल स्कूटर और कार चलाई, जिस से कभी रुक कर ना पूछा कि कैसा है मेरे भाई ? ये वो अपना है हो उम्र और हालात के साथ बदल नहीं जाता है, ये बात है उस रास्ते की जो मेरे घर की ओर जाता है ॥
चूमें जिसने मेरे पिता और मेरे कदम , मेरे बच्चे को भी वो उतना ही सहलाता है , बुजुर्ग हो गया है पर चेहरे पर वही नूर है , वो जीवन में स्थिर और सच्चा रहना सिखाता है, ये बात है उस रास्ते की जो मेरे घर की ओर जाता है॥
जिसके ऊपर शादियों में नाचे, जिसपे चल के मैयितें दफ़नाई। एहसानमंद हूँ उसका जो उसने ऐसी सीख़ सिखाई, न जाने इस दोस्त के साथ ऐसा क्या मेरा नाता है । इस बार बात इंसानों की नहीं कर रहा, ये बात है उस रास्ते की जो मेरे घर की ओर जाता है ॥


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