चाँद का सूरज – Delhi Poetry Slam

Extended window till November 15th to submit your poetry ✍️🥇

चाँद का सूरज

By Kritika Aithani

के एक रात जब देख रही थी चाँद को
तो तब कही जाके मैने अपने बारे कुछ सोचा हैं,
तेरी चाहत में ना जाने कितने पन्नों में चीखा हैं।
दुनिया तो मुझे पागल कहती है, तू बता, तू मुझे क्या कहता है?
ऐ चाँद बता, आखिर मेरी आवाज़ कहाँ तक जाती हैं?
सुना है दिल की बातें अक्सर बीच मे रुक जाती है।
तेरा लहजा मुझे कुछ दूर कर रहा है,
कही मैं अब सितारों मे न समा जाऊ।
बादलों से जो कभी तेरा दीदार हो जाया करता था
तेरा चेहरा अब मुझे दिखाई नही पड़ता है।
बात वफा की है,न मोहब्बत की
बात तो ये है, की तेरा साथ अब अच्छा क्यों नहीं लगता हैं?
मुझे अब जिंदगी मे अंधेरा चाहिए,
चाँद और सूरज को अब घर जाना चाहिए।


Leave a comment