माँ को सजाते हैं – Delhi Poetry Slam

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माँ को सजाते हैं

By Karnika Verma


माँ है तू, सम्भाल लेगी।
हमारी गल्ती पर पर्दा डाल लेगी।
है ये परीक्षा सहनशीलता की।
माँ के निःस्वार्थ प्रेम की।

लहलहाता था वन-उपवन,
माँ के सौंदर्य में हरियाली थी।
बेहद सुखद था जन-जीवन, 
माँ के हृदय में खुशहाली थी।

चीरा है सीना माँ का।
रौंदा है आँगन माँ का।
उखाड़ फेंके वृक्ष सभी।
माँ की खुशियाँ हैं लूटी।

हर बार बैठी है रूदन को,
हर बार ये धरती डोली है।
अपनी करूण पुकार सुनाने को,
फिर से ये धरती बोली है।

कितनी वंशावली नष्ट हुई।
कितने मवेशी गृह-हीन हुए।
खोदी है कब्र कीटों की,
ऊपर जिनके आसीन हुए। 

वस्त्र नहीं माँ के अंग पर।
चीथड़ा है चीर के नाम पर।
बंजर-बेजार खड़ी है माँ।
हिम्मत से बहुत बड़ी है माँ।

स्वच्छंद पंछी विचरण करते,
आसमानी चोली माँ को उड़ाते।
पहनाते हैं माँ को समुद्री लहंगा,
समाती हैं जिसमें यमुना-गंगा। 

हरा-हरा आँचल माँ के तन में,
रंग-बिरंगे फूलों की क्यारियाँ जिसमें,
तितली-भंवरे राग सुनाते।
भीनी-भीनी सुगन्ध महकाते।

स्वर्णिम आभा लिए माँ का ताज।
नवरत्न जड़ित जिनका राज।
सिंहनी-सा जिनका अन्दाज।
माँ के वर्चस्व का फिर हो आगाज।

फिर से धरती की रौनक बढ़ाते हैं।
हर प्राणी का हक दिलाते हैं।
अपना भविष्य बचाते हैं।
आओ चलो! माँ को सजाते हैं।
आओ चलो! माँ को सजाते हैं।

कर्णिका विवेक वर्मा


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