जूते जो सबक दे गए – ज़िंदगी के अनमोल अनुभव – Delhi Poetry Slam

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जूते जो सबक दे गए – ज़िंदगी के अनमोल अनुभव

By Jyotsna Varan

जूते पहने, सफर शुरू हुआ,
कभी तेज़ चले, कभी धीरे हुए 
कभी रास्तों ने थकाया,
कभी ठोकरों ने रास्ता दिखाया।

पहले सोचा था कि जूते बस पहनने के लिए होते हैं,
पर धीरे-धीरे समझ आया,
कि हर घिसी हुई एड़ी,
हर टूटा हुआ तल्ला,
एक कहानी कहता है 
कहानियाँ जो दर्द की मिट्टी में भीगकर पकी हैं,
जिन्हें शब्दों में कहना आसान नहीं,
पर महसूस करना जरूरी है।

कुछ रास्ते मुलायम थे,
जैसे बचपन की वो धूल-मिट्टी,
जहां चोट भी खेल लगती थी,
पर कुछ पथरीले थे,
जैसे रिश्तों के वो कड़े मोड़,
जहां दिल फिसल जाता है,
पर जूते… हाँ, जूते,
वो जमे रहे, चुप रहे,
पर हर कदम का बोझ अपने सीने पर सहते रहे।

कभी इन जूतों ने किसी शादी में चमक बिखेरी,
जहां हंसी के रंग थे,
तो कभी किसी अंतिम यात्रा में
गहराई से भरे सन्नाटे के बीच चलते रहे,
जहां हर कदम पर मन कांप रहा था।

कभी खुशी के कदमों का हिस्सा बने,
तो कभी आंसुओं के साथ बहते रहे 
पर शिकायत कभी नहीं की,
बस चलते रहे,
जैसे ज़िंदगी भी तो करती है।

जूते तो मेरे पैरों में थे,
पर असल में वो जूतों ने ही मुझे संभाला,
उन्होंने सिखाया कि कैसे गिरकर उठना है,
कैसे धूल झाड़कर फिर से आगे बढ़ना है।

जब मन हार मान लेता,
तो जूतों की घिसी एड़ी फुसफुसाती,
“रुक मत, तू अभी अधूरी है।”

इन जूतों में छुपे हैं वो रास्ते
जहां सपनों ने दम तोड़ा,
और कुछ नए सपनों ने जन्म लिया।
जहां मोहब्बत के निशान पड़े,
और कुछ निशान धोखा बनकर चिपक गए।
जहां कभी दिल टूटा,
तो कभी उम्मीद की किरण फूटी।

अब जब जूते उतारकर देखती हूँ,
तो एहसास होता है,
कि सफर खत्म नहीं हुआ,
बस एक नए रास्ते की शुरुआत हुई है।
जूते पुराने हो गए,
पर उनके अंदर बसी कहानियाँ आज भी ताज़ा हैं।

क्योंकि…
ये जूते नहीं,
मेरे खामोश हमसफ़र हैं,
जिन्होंने हर दर्द को चुपचाप सहा,
हर खुशी को बिना शोर के जिया।

आज भी जब मैं अपने जूतों को देखती हूँ,
तो वो मुझसे पूछते हैं,
“क्या तू अब भी थकी है?
या चलने के लिए तैयार?”

और मैं मुस्कुरा कर कहती हूँ,
“चलो… फिर एक नया सफर शुरू करें।”


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