युग गाथा – Delhi Poetry Slam

युग गाथा

By Jyoti Kapoor 

मिट्टी की गोद में सोई थी 
अनभिज्ञ स्वप्न में खोई थी 
क्यों जनक धरा को जोत गए
सेवा हेतु जल स्त्रोत दिये 
अब आँखों से वो गिरते हैं
ज़ख्मों को आंसू सिलते हैं।   

वो त्रेता था वहाँ राम भी थे
दानव थे नीतिवान भी थे
जब रावण ने अपहरण किया 
अग्नि का मैंने वरण किया 
राम ना फिर भी रख पाए
दामन में माँ के छोड़ आए 
धरती की गोद में जब लौटी 
चाहा था यहीं रहूँ सोती।  

फिर भी हर युग में आयी मैं
प्रकृति थी ना सकुचाई मैं
द्दुःशासन ने आँचल खींचा
था धर्मराज का सिर नीचा
कृष्णा को मैंने पुकारा था
नहीं कोई और ललकारा था 
अब कलियुग का सरमाया है 
यहाँ राम कृष्ण सिर्फ़ माया है।  

इस युग में जनक क्यों हल जोता
क्यों माँ ने श्वास नहीं रोका 
विकास को ताक़त जान लिया
डिग्री को कवच है मान लिया
फिर से वो काली रात आई
सभा में थे अताताई
आँखों में चश्मे तोड़ दिये
गुड़िया से बदन मरोड़ दिये।  

जिन अंगों से जीवन पाया 
उन जननागों को रोंदाया
माँ बिलख बिलख के रोती है
कोई बहन नहीं अब सोती है 
आतंकित हर एक आँख हुई
भय से फिर धरती काँप गई
भूकंप में सबके स्वप्न मिले 
कुर्सी वाले पर नहीं हिले।  

चौराहे पे चिल्लाते हैं
दो पैसों में बिक जाते हैं
अवसर है चिता जलाई है 
फिर रोटी सेक के खाई है 
अभी राम राज्य बहुत दूर है
जनता इतनी मजबूर है 
और कितनी आहूति माँगोगी
काली माँ अब कब जागोगी।   

मंदिर में कब तक नाचोगी
दैत्यों का सिर कब काटोगी
माँ ममता से ना जतन करो 
पर्दा चूड़ी को ख़त्म करो 
चुप्पी में चीख छुपाई है
चीत्कार तभी तो आयी है 
बाहर निकलो अब घर छोड़ो
राखी छोड़ो बंधन तोड़ो।  

तोड़ो सदिओं के तालों को 
ज़ंजीरों में बंधे ख़्यालों को 
नहीं राम बचाने आयेंगे
नहीं कृष्ण ओढ़नी लाएँगे
अब अपनी तुम हुंकार भरो
शक्ति को स्वयं स्वीकार करो
एक हाथ खड़ग एक हाथ गदा 
जहां नज़र उठे वहाँ वॉर करो।  

और हाथ बड़ा के थाम लो 
उस भटकी अबला नारी को
नहीं अकेले चलने देंगे 
अब किसी अनाथ बेचारी को 
एक दूजे की अब नाथ बनो
एक दूजे का संबल बन जाओ
नहीं रहे अनाथ ना कोई अबला
इन शब्दों को अब दफ़नाओ !


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