रूप के दर्जी इंसान बनो – Delhi Poetry Slam

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रूप के दर्जी इंसान बनो

By Janhavi Verma

रंगीन जग को रंगों की कदर सीखा न पाया,
सावले रंग को जग ने खामी ठहराया,
रंग ही खूबसूरती की परिभाषा से मैं मेल न खाया, 
बदन के दाग मैं मिटा न पाया,
कमियां खास है बता ना पाया,
बदशुराती के तानों से कानो बचा न पाया।

खूबसूरती का माप न मांगों रूप के दर्जी इंसान बनो।

खूबसूरती का यू तो कोई नाप नही होता,
बंद फिर भी यह भेदभाव का जाप नही होता,
दूसरो को बदलने तैयार बैठे बन दर्जी, 
थोड़ी इधर सिलाई,थोड़ी उधर खिंचाई।

नेत्र बदलने पर नज़रिया नही बदलता, 
रूप बदलने पर रूह नही बदलती, 
एक ही रूह से पहले नफरत फिर प्यार तक का
सफर क्यों होजाता है?
समाज की खूबसूरती की परिभाषा में सिकुड़ कर कैद होजने पर,
खूबसूरती का माप न मांगों रूप के दर्जी इंसान बनो ।

क्यू ना जिस्म की जगह रूह में कुछ सुधार करे, 
कुछ कमियां हम,कुछ आप माफ करे,
एकदूसरे को कम आंकने की जगह दिल थोड़ा साफ करे, 
बातों में चुभन नही थोड़ी मिठास भरे,
ताकि अलग होना न पाप लगे, 
अलग होकर भी इंसान, इंसान लगे।
खूबसूरती का माप न मांगों,
रूप के दर्जी इंसान बनो।


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